Friday, 19 May 2017

गज़ल
साये में कुत्ते बिल्लियाँ इंसान धूप में
तहज़ीब चढ़ने लग गई परवान धूप में
ख़्वबों को शब ने प्यार से आग़ोश में लिया
दर दर भटक रही है मेरी जान धूप में
सदियों से मेरी पलकों के दरवाजे बंद हैं
सदियों से है खड़ा हुआ मेहमान धूप में
इस शहरे बे शजर से न रखें कोई उम्मीद
होता यहाँ है गुल का भी सम्मान धूप में
जाड़े की सुबह में जो निकलता है आफताब
देखो गरीब बच्चों की मुस्कान धूप में
जाने कहाँ चला गया वह शख्स चाँद सा
इक पल में अपना छोड़कर सामान धूप में
कमजोर थे सतून छतें घर की गिर गईं
अब चीख़ने लगे हैं मुसलमान धूप में
एम आर चिश्ती

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