Wednesday, 18 March 2020

सपनों को मत मरने देना
(कहानी)
एम आर चिश्ती. उर्दु मध्य विद्यालय, पकड़ी पकोही, मड़वन, मुज़फ़्फ़रपुर
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दरवाजे पर कोई बार बार दस्तक दे रहा था इससे पहले कि मैं उठ कर जाता मेरा छोटा बेटा दरवाज़ा खोलने चला गया.
वो गर्मी की एक खूबसूरत सुबह थी. मैंने बाहर निकल कर आने वाले को देखा तो एक बार में न पहचान पाया. कोई औरत थी जिसकी गोद में एक छोटी सी बच्ची थी. जब करीब से देखा तो बोल पड़ा.
'' सुलेखा तुम..... कैसी हो...? ''
पहले तो उसने मेरे पाँव छुए. फिर बोली '' कल ही आयी हूं, सोचा कि सर से मिल लूँ... ''
इसी बीच मेरी बीवी भी आ गई. उसने एक नज़र सुलेखा को देखा तो उसे यक़ीन ही नहीं हुआ जब पहचान ली तो उसे गले लगा ली.हम लोग कुछ देर यूँही खड़े खड़े बात करते रहे, जिससे पता चला कि वो एक हफ्ते के लिए अपनी बेटी खुशबु के साथ पापा के घर आयी है. कुछ देर बाद मेरी बीवी ने खुशबु को अपनी गोद मे लिया और सुलेखा के साथ अंदर कमरे मे चली गई और मैं अपने कमरे मे आ गया.
सुलेखा को आज दस साल बाद अपने सामने पाकर मैं गुज़रे दिनों की याद मे खो गया.
मैंने इस गाँव मे नया नया स्कूल जॉइन किया था. नया इलाक़ा नये लोग. शुरू के दिनों में तो बिल्कुल ही दिल नहीं लगता, जी चाहता कि छोड़ दूँ इस नौकरी को और अपने गाँव चला जाऊँ. मगर धीरे धीरे इस माहौल से मोहब्बत होने लगी.
एक दिन मैं छठे क्लास के बच्चों को पढ़ा रहा था तब ही आख़िरी बेंच पर बैठी एक बच्ची पर नजर पड़ी मैंने पहली बार उसे स्कूल में देखा था. जब उससे नाम पूछा तो उसने मुस्कराते हुए बताया. सुलेखा.......
ये मेरी उससे पहली मुलाकात थी. वक्त गुजरने के साथ साथ वो पूरे स्कूल की खास बच्ची बन गई. सभी शिक्षक उसे प्यार करते. वो थी भी बहुत मेधावी. पढ़ाई के साथ साथ खेल कूद मे भी हमेशा प्रथम आती.
एक दिन मैंने उससे पूछा था '' सुलेखा, तुम आगे चलकर क्या बनना चाहती हो? ''
'' टीचर '' वो चहक कर बोल उठी थी.
'' क्यूँ? ''
'' टीचर बच्चों को ज्ञान देते हैं. उनको सही और गलत के बारे में बताते हैं''
वह कुछ देर रुकी फिर बोली '' अगर सच में सब लोग शिक्षित हो जाएं तो बहुत सी बुराइयाँ खुद ही समाप्त हो जायेंगी ''
'' कौन सी बुराइयाँ? '' मैं उसके जवाब पर हंसते हुए बोला.
'' दहेज प्रथा, बाल विवाह,.... अगर लोग शिक्षित हो जाएंगे तो उन्हें इसके परिणाम के बारे में पहले ही पता चल जाएगा. ''
बात आगे बढ़ती मगर घंटी लग गई.
जब मैं कभी अकेला बैठा होता तो सुलेखा मेरे पास आ जाती. सुलेखा की बातों से मैंने जान लिया था कि वो तीन बहने थीं. सुलेखा से बड़ी दोनों बहने भी पढ़ने मे बहुत तेज़ थीं मगर दोनों की शादी बहुत कम उम्र मे कर दी गई. जब उनकी बात सुलेखा से होती तो सुलेखा को एहसास होता था कि बाल विवाह की वजह से दोनों के सपने अधूरे रह गए थे. जिसका उनको बहुत दुख था
'' अगर तुम्हारी शादी भी जल्द हो जाये तो... '' एक दिन मैंने उससे पूछा था. उन दिनों स्कूल मे परीक्षा चल रही थी दूसरी पाली की परीक्षा में अभी आधा घंटा समय था.. मैं स्कूल के बरामदे मे बैठा चाय पी रहा था वो मेरे सामने खड़ी थी
'' नहीं सर...... '' वो शरमा गई. '' मुझे अपना सपना पूरा करना है. मुझे पढ़ लिख कर टीचर बनना है. '' वो बहुत कुछ बोलती रही मैं सुनता रहा उसकी नजर दूर उड़ती हुई चिडियों पर थी और मैं उसकी आँखों मे तैरते हुए सपनों को देख रहा था.
दिन गुज़रते गये उसने 8 वीं की परीक्षा पास की और किसी हाई स्कूल में दाखिला करा लिया.
मुझे याद है विदाई समारोह के बाद वो मेरे पास आकर बहुत रोई थी. मैंने उसके सर पर हाथ रखकर बस इतना कहा था कि सुलेखा अपने सपनों को मत मरने देना.
स्कूल से जाने के बाद वो कई बार मुझसे मिलने आयी. पहले तो अक्सर आ जाती मगर वक्त के साथ साथ उसका आना बहुत कम हो गया.
एक दिन जब मैं स्कूल गया तो सुलेखा के भाई को इंतजार करता हुआ पाया. उसने मुझे प्रणाम किया और शादी का एक कार्ड मेरी तरफ बढ़ा दिया. मैंने उसे खोल कर देखा तो चौंक गया.
'' ये.. ये क्या.. सुलेखा ने तो अभी मैट्रिक भी नहीं किया.. और.... ''
'' जी सर.. पापा को एक अच्छा लड़का मिल गया.. इसलिए पापा तैयार हो गये..'' वो कुछ बोलता रहा मगर मैं बहरा हो चुका था..
मुझे पुरानी बात याद आ गयी थी. '' सुलेखा! अपने सपनों को मरने मत देना ''
मगर उसका सपना मर चुका था.
वो चली गई अपने पिया के घर, अपने सपनों का जनाजा  उठाए हुए.
समय के साथ यादों के आईने पर धूल पड़ने लगी. अब वो मुझे याद तो आती मगर बहुत कम. इस बीच मैंने स्कूल के पास ही अपना छोटा सा घर बना लिया था. सुलेखा के पापा अक्सर मेरे घर आते. उनसे सुलेखा के बारे में पता चलता. एक दिन ये सुनकर मैं कांप उठा की एक सड़क हादसे मे सुलेखा के पति की मौत हो गई थी कुछ माह पहले ही उसके आँगन मे एक फूल बच्ची ने आँखें खोली थीं. मेरी आँखें भीग गयीं. गुज़रे दिन फिर याद आने लगे थे. इस छोटी सी जान को कितनी मुसीबतें झेलनी पड़ी थीं.
जो होना होता है वो हो कर ही रहता है, ज़िन्दगी भला रुकती कहाँ है. सुलेखा को अपने पति की जगह पर नौकरी मिल गई. अगर उसने इन्टर कर लिया होता तो अच्छा पोस्ट मिल सकता था मगर वो सिर्फ नौ तक पढ़ी थी. इस लिए चौथे ग्रेड की नौकरी मिली.
मुझे उससे मिले दस साल हो गये थे. एक दो बार वो अपने मैके आयी भी तो मैं यहाँ नहीं था इसलिए नहीं मिल सका.
'' सर! चाय.... ''
अचानक मैं यादों की दुनिया से बाहर निकल आया.. सुलेखा सामने खड़ी थी.
'' हाँ! '' मैंने मुस्कराते हुए, ट्रे से चाय की प्याली उठाई. इस बीच उसकी बेटी भी आ गई थी ''किस क्लास मे पढ़ती है ये? '' मैंने उसकी बेटी को देखते हुए पूछा
'' नर्सरी मे है अभी... मगर बहुत चंचल है.. '' सुलेखा बच्ची के गाल पे प्यार से एक थप्पड़ लगाते हुए बोली.
'' और तुम्हारा क्या चल रहा है? ''
वो अचानक चुप हो गई.. फिर धीमी आवाज़ मे बोली '' ठीक ही चल रहा है सर ''
मुझे एहसास हो गया कि उसे आज भी पढ़ाई पूरी न कर पाने का दुख है. उसे तो टीचर बनना था. दूसरों को शिक्षित करना था... मगर
मैं अचानक सुलेखा से पूछ बैठा '' खुशबु को क्या बनाओगी.?
'' टीचर.... '' उसने चहक कर कहा.... मुझे गुज़रा ज़माना याद आ गया. उस वक्त भी उसने बिल्कुल इसी तरह कहा था...
मैंने खुशबु को अपनी गोद में उठा लिया और चूमने लगा. सुलेखा हंसते हुए मुझे देख रही थी... उसकी आंखों मे नये सपने जन्म ले रहे थे.

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